मेरी कश्ती को शायद तूफ़ान से ही इश्क़ था,
वरना साहिल तो तुम्हारी आँखों में साफ़ दिखा था।
मैंने मजबूरियों का नाम देकर मुँह मोड़ लिया,
पर सच तो ये है कि मुझे सुकून से डर लगा था।
मुझे आदत थी टूटने और बिखरने की,
और तुम.. तुम्हारा आना तो जैसे मुझे समेटने जैसा था।
तुम कोई पहेली नहीं जिसे सुलझाना पड़े,
तुम वो खुली किताब थी जिसके हर पन्ने पर सुकून लिखा था।